Saturday, June 27, 2020

सूरए क़ाफ़ 50


50 सूरए क़ाफ़

सूरए क़ाफ़ मक्का में नाजि़ल हुई है और इसकी पैंतालीस आयतें हैं

ख़ुदा के नाम से (शुरू करता हूँ) जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है

क़ाफ़ क़ुरआन मजीद की क़सम (मोहम्मद पैग़म्बर हैं) (1) लेकिन इन (काफ़िरों) को ताज्जुब है कि उन ही में एक (अज़ाब से) डराने वाला (पैग़म्बर) उनके पास आ गया तो कुफ़्फ़ार कहने लगे ये तो एक अजीब बात है (2) भला जब हम मर जाएँगे और (सड़ गल कर) मिटटी हो जाएँगे तो फिर ये दोबार जि़न्दा होना (अक़्ल से) बईद (बात है) (3) उनके जिस्मों से ज़मीन जिस चीज़ को (खा खा कर) कम करती है वह हमको मालूम है और हमारे पास तो तहरीरी याददाश्त किताब लौहे महफूज़ मौजूद है (4) मगर जब उनके पास दीन (हक़) आ पहुँचा तो उन्होने उसे झुठलाया तो वह लोग एक ऐसी बात में उलझे हुए हैं जिसे क़रार नहीं (5) तो क्या इन लोगों ने अपने ऊपर आसमान की नज़र नहीं की कि हमने उसको क्यों कर बनाया और उसको कैसी ज़ीनत दी और इसमें कहीं शिगाफ्त तक नहीं (6) और ज़मीन को हमने फैलाया और उस पर बोझल पहाड़ रख दिये और इसमें हर तरह की ख़ुशनुमा चीज़ें उगाई ताकि तमाम रूजू लाने वाले (7) (बन्दे) हिदायत और इबरत हासिल करें (8) और हमने आसमान से बरकत वाला पानी बरसाया तो उससे बाग़ (के दरख़्त) उगाए और खेती का अनाज और लम्बी लम्बी खजूरें (9) जिसका बौर बाहम गुथा हुआ है (10) (ये सब कुछ) बन्दों को रोज़ी देने के लिए (पैदा किया) और पानी ही से हमने मुर्दा शहर (उफ़तादा ज़मीन) को जि़न्दा किया (11) इसी तरह (क़यामत में मुर्दों को) निकलना होगा उनसे पहले नूह की क़ौम और ख़न्दक़ वालों और (क़ौम) समूद ने अपने अपने पैग़म्बरों को झुठलाया (12) और (क़ौम) आद और फ़िरऔन और लूत की क़ौम (13) और बन के रहने वालों (क़ौम शुऐब) और तुब्बा की क़ौम और (उन) सबने अपने (अपने) पैग़म्बरों को झुठलाया तो हमारा (अज़ाब का) वायदा पूरा हो कर रहा (14) तो क्या हम पहली बार पैदा करके थक गये हैं (हरगिज़ नहीं) मगर ये लोग अज़ सरे नौ (दोबारा) पैदा करने की निस्बत शक में पड़े हैं (15) और बेशक हम ही ने इन्सान को पैदा किया और जो ख़्यालात उसके दिल में गुज़रते हैं हम उनको जानते हैं और हम तो उसकी शहरग से भी ज़्यादा क़रीब हैं (16) जब (वह कोई काम करता हैं तो) दो लिखने वाले (केरामन क़ातेबीन) जो उसके दाहिने बाएं बैठे हैं लिख लेते हैं (17) कोई बात उसकी ज़बान पर नहीं आती मगर एक निगेहबान उसके पास तैयार रहता है (18) मौत की बेहोशी यक़ीनन तारी होगी (जो हम बता देंगे कि) यही तो वह (हालात है) जिससे तू भागा करता था (19) और सूर फूँका जाएगा यही (अज़ाब) के वायदे का दिन है और हर शख़्स (हमारे सामने) (इस तरह) हाजि़र होगा (20) कि उसके साथ एक (फरिश्ता) हांका लाने वाला होगा (21) और एक (आमाल का) गवाह उससे कहा जाएगा कि उस (दिन) से तू ग़फ़लत में पड़ा था तो अब हमने तेरे सामने से पर्दे को हटा दिया तो आज तेरी निगाह बड़ी तेज़ है (22) और उसका साथी (फ़रिश्ता) कहेगा ये (उसका अमल) जो मेरे पास है (23) (तब हुक्म होगा कि) तुम दोनों हर सरकश नाशुक्रे को दोज़ख़ में डाल दो (24) जो (वाजिब हुकूक से) माल में बुख़्ल करने वाला हद से बढ़ने वाला (दीन में) शक करने वाला था (25) जिसने ख़ुदा के साथ दूसरे माबूद बना रखे थे तो अब तुम दोनों इसको सख़्त अज़ाब में डाल ही दो (26) (उस वक़्त) उसका साथी (शैतान) कहेगा परवरदिगार हमने इसको गुमराह नहीं किया था बल्कि ये तो ख़ुद सख़्त गुमराही में मुब्तिला था (27) इस पर ख़ुदा फ़रमाएगा हमारे सामने झगड़े न करो मैं तो तुम लोगों को पहले ही (अज़ाब से) डरा चुका था (28) मेरे यहाँ बात बदला नहीं करती और न मैं बन्दों पर (ज़र्रा बराबर) ज़ुल्म करने वाला हूँ (29) उस दिन हम दोज़ख़ से पूछेंगे कि तू भर चुकी और वह कहेगी क्या कुछ और भी हैं (30) और बेहिष्त परहेज़गारों के बिलकुल करीब कर दी जाएगी (31) यही तो वह बेहिष्त है जिसका तुममें से हर एक (ख़ुदा की तरफ़) रूजू करने वाले (हुदूद की) हिफाज़त करने वाले से वायदा किया जाता है (32) तो जो शख़्स ख़ुदा से बे देखे डरता रहा और ख़ुदा की तरफ़ रूजू करने वाला दिल लेकर आया (33) (उसको हुक्म होगा कि) इसमें सही सलामत दाखि़ल हो जाओ यहीं तो हमेशा रहने का दिन है (34) इसमें ये लोग जो चाहेंगे उनके लिए हाजि़र है और हमारे यहाँ तो इससे भी ज़्यादा है (35) और हमने तो इनसे पहले कितनी उम्मतें हलाक कर डाली जो इनसे क़ूवत में कहीं बढ़ कर थीं तो उन लोगों ने (मौत के ख़ौफ से) तमाम शहरों को छान मारा कि भला कहीं भी भागने का ठिकाना है (36) इसमें शक नहीं कि जो शख़्स (आगाह) दिल रखता है या कान लगाकर हुज़ूरे क़ल्ब से सुनता है उसके लिए इसमें (काफ़ी) नसीहत है (37) और हमने ही यक़ीनन सारे आसमान और ज़मीन और जो कुछ उन दोनों के बीच में है छहः दिन में पैदा किए और थकान तो हमको छुकर भी नहीं गयी (38) तो (ऐ रसूल) जो कुछ ये (काफि़र) लोग किया करते हैं उस पर तुम सब्र करो और आफ़ताब के निकलने से पहले अपने परवरदिगार के हम्द की तस्बीह किया करो (39) और थोड़ी देर रात को भी और नमाज़ के बाद भी उसकी तस्बीह करो (40) और कान लगा कर सुन रखो कि जिस दिन पुकारने वाला (इसराफ़ील) नज़दीक ही जगह से आवाज़ देगा (41) (कि उठो) जिस दिन लोग एक सख़्त चीख़ को बाख़ूबी सुन लेगें वही दिन (लोगों) के कब्रों से निकलने का होगा (42) बेषक हम ही (लोगों को) जि़न्दा करते हैं और हम ही मारते हैं (43) और हमारी ही तरफ फिर कर आना है जिस दिन ज़मीन (उनके ऊपर से) फट जाएगी और ये झट पट निकल खड़े होंगे ये उठाना और जमा करना (44) और हम पर बहुत आसान है (ऐ रसूल) ये लोग जो कुछ कहते हैं हम (उसे) ख़ूब जानते हैं और तुम उन पर जब्र तो देते नहीं हो तो जो हमारे (अज़ाब के) वायदे से डरे उसको तुम क़ुरआन के ज़रिए नसीहत करते रहो (45)
(दुवा: ऐ हमारे प्यारे अल्लाह जिस दिन हमारे आमाल का हिसाब होने लगे मुझे मेरे माँ बाप और खानदान वालो को और सारे ईमानवालो को तू अपनी खास रेहेमत से बख्श दे। आमीन)

सूरए अज ज़ारियात 51


51 सूरए अज ज़ारियात

सूरए अज ज़ारियात मक्का में नाजि़ल हुई है और उसकी साठ आयते है

ख़ुदा के नाम से (शुरू करता हूँ) जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है

उन (हवाओं की क़सम) जो (बादलों को) उड़ा कर तितर बितर कर देती हैं (1) फिर (पानी का) बोझ उठाती हैं (2) फिर आहिस्ता आहिस्ता चलती हैं (3) फिर एक ज़रूरी चीज़ (बारिश) को तक़सीम करती हैं (4) कि तुम से जो वायदा किया जाता है ज़रूर बिल्कुल सच्चा है (5) और (आमाल की) जज़ा (सज़ा) ज़रूर होगी (6) और आसमान की क़सम जिसमें रहते हैं (7) कि (ऐ एहले मक्का) तुम लोग एक ऐसी मुख़्तलिफ़ बेजोड़ बात में पड़े हो (8) कि उससे वही फेरा जाएगा (गुमराह होगा) (9) जो (ख़ुदा के इल्म में) फेरा जा चुका है अटकल दौड़ाने वाले हलाक हों (10) जो ग़फलत में भूले हुए (पड़े) हैं पूछते हैं कि जज़ा का दिन कब होगा (11) उस दिन (होगा) (12) जब इनको (जहन्नुम की) आग में अज़ाब दिया जाएगा (13) (और उनसे कहा जाएगा) अपने अज़ाब का मज़ा चखो ये वही है जिसकी तुम जल्दी मचाया करते थे (14) बेशक परहेज़गार लोग (बेहिश्त के) बाग़ों और चश्मों में (ऐश करते) होगें (15) जो उनका परवरदिगार उन्हें अता करता है ये (ख़ुश ख़ुश) ले रहे हैं ये लोग इससे पहले (दुनिया में) नेको कार थे (16) (इबादत की वजह से) रात को बहुत ही कम सोते थे (17) और पिछले पहर को अपनी मग़फि़रत की दुआएं करते थे (18) और उनके माल में माँगने वाले और न माँगने वाले (दोनों) का हिस्सा था (19) और यक़ीन करने वालों के लिए ज़मीन में (क़ुदरते ख़ुदा की) बहुत सी निशानियाँ हैं (20) और ख़ुदा तुम में भी हैं तो क्या तुम देखते नहीं (21) और तुम्हारी रोज़ी और जिस चीज़ का तुमसे वायदा किया जाता है आसमान में है (22) तो आसमान व ज़मीन के मालिक की क़सम ये (क़ुरआन) बिल्कुल ठीक है जिस तरह तुम बातें करते हो (23) क्या तुम्हारे पास इबराहीम के मुअजि़ज़ मेहमानो (फ़रिश्तों) की भी ख़बर पहुँची है कि जब वह लोग उनके पास आए (24) तो कहने लगे (सलामुन अलैकुम) तो इबराहीम ने भी (अलैकुम) सलाम किया (देखा तो) ऐसे लोग जिनसे न जान न पहचान (25) फिर अपने घर जाकर जल्दी से (भुना हुआ) एक मोटा ताज़ा बछड़ा ले आए (26) और उसे उनके आगे रख दिया (फिर) कहने लगे आप लोग तनाउल क्यों नहीं करते (27) (इस पर भी न खाया) तो इबराहीम उनसे जो ही जी में डरे वह लोग बोले आप अन्देशा न करें और उनको एक दानिशमन्द लड़के की ख़ुशख़बरी दी (28) तो (ये सुनते ही) इबराहीम की बीवी (सारा) चिल्लाती हुयी उनके सामने आयीं और अपना मुँह पीट लिया कहने लगीं (ऐ है) एक तो (मैं) बुढि़या (उस पर) बांझ (29) लड़का क्यों कर होगा फ़रिश्ते बोले तुम्हारे परवरदिगार ने यूँ ही फ़रमाया है वह बेशक हिकमत वाला वाकि़फ़कार है (30) तब इबराहीम ने पूछा कि (ऐ ख़ुदा के) भेजे हुए फ़रिश्तों आखि़र तुम्हें क्या मुहिम दर पेश है (31) वह बोले हम तो गुनाहगारों (क़ौमे लूत) की तरफ़ भेजे गए हैं (32) ताकि उन पर मिटटी के पथरीले खरन्जे बरसाएँ (33) जिन पर हद से बढ़ जाने वालों के लिए तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से निशान लगा दिए गए हैं (34) ग़रज़ वहाँ जितने लोग मोमिनीन थे उनको हमने निकाल दिया (35) और वहाँ तो हमने एक के सिवा मुसलमानों का कोई घर पाया भी नहीं (36) और जो लोग दर्दनाक अज़ाब से डरते हैं उनके लिए वहाँ (इबरत की) निशानी छोड़ दी और मूसा (के हाल) में भी (निशानी है) (37) जब हमने उनको फ़िरऔन के पास खुला हुआ मौजिज़ा देकर भेजा (38) तो उसने अपने लशकर के बिरते पर मुँह मोड़ लिया और कहने लगा ये तो (अच्छा ख़ासा) जादूगर या सौदाई है (39) तो हमने उसको और उसके लशकर को ले डाला फिर उन सबको दरिया में पटक दिया (40) और वह तो क़ाबिले मलामत काम करता ही था और आद की क़ौम (के हाल) में भी निशानी है हमने उन पर एक बे बरकत आँधी चलायी (41) कि जिस चीज़ पर चलती उसको बोसीदा हडडी की तरह रेज़ा रेज़ा किए बग़ैर न छोड़ती (42) और समूद (के हाल) में भी (क़ुदरत की निशानी) है जब उससे कहा गया कि एक ख़ास वक़्त तक ख़ूब चैन कर लो (43) तो उन्होने अपने परवरदिगार के हुक्म से सरकशी की तो उन्हें एक रोज़ कड़क और बिजली ने ले डाला और देखते ही रह गए (44) फिर न वह उठने की ताक़त रखते थे और न बदला ही ले सकते थे (45) और (उनसे) पहले (हम) नूह की क़ौम को (हलाक कर चुके थे) बेशक वह बदकार लोग थे (46) और हमने आसमानों को अपने बल बूते से बनाया और बेशक हममें सब क़ुदरत है (47) और ज़मीन को भी हम ही ने बिछाया तो हम कैसे अच्छे बिछाने वाले हैं (48) और हम ही ने हर चीज़ की दो दो कि़स्में बनायीं ताकि तुम लोग नसीहत हासिल करो (49) तो ख़ुदा ही की तरफ़ भागो मैं तुमको यक़ीनन उसकी तरफ़ से खुल्लम खुल्ला डराने वाला हूँ (50) और ख़ुदा के साथ दूसरा माबूद न बनाओ मैं तुमको यक़ीनन उसकी तरफ़ से खुल्लम खुल्ला डराने वाला हूँ (51) इसी तरह उनसे पहले लोगों के पास जो पैग़म्बर आता तो वह उसको जादूगर कहते या सिड़ी दीवाना (बताते) (52) ये लोग एक दूसरे को ऐसी बात की वसीयत करते आते हैं (नहीं) बल्कि ये लोग हैं ही सरकश (53) तो (ऐ रसूल) तुम इनसे मुँह फेर लो तुम पर तो कुछ इल्ज़ाम नहीं है (54) और नसीहत किए जाओ क्योंकि नसीहत मोमिनीन को फ़ायदा देती है (55) और मैने जिनों और आदमियों को इसी ग़रज़ से पैदा किया कि वह मेरी इबादत करें (56) न तो मैं उनसे रोज़ी का तालिब हूँ और न ये चाहता हूँ कि मुझे खाना खिलाएँ (57) ख़ुदा ख़ुद बड़ा रोज़ी देने वाला ज़ोरावर (और) ज़बरदस्त है (58) तो (इन) ज़ालिमों के वास्ते भी अज़ाब का कुछ हिस्सा है जिस तरह उनके साथियों के लिए हिस्सा था तो इनको हम से जल्दी न करनी चाहिए (59) तो जिस दिन का इन काफि़रों से वायदा किया जाता है इससे इनके लिए ख़राबी है (60)
(दुवा: ऐ हमारे प्यारे अल्लाह जिस दिन हमारे आमाल का हिसाब होने लगे मुझे मेरे माँ बाप और खानदान वालो को और सारे ईमानवालो को तू अपनी खास रेहेमत से बख्श दे। आमीन)

सूरए अत तूर 52


52 सूरए अत तूर

सूरए अत तूर मक्का में नाजि़ल हुई है और इसकी उन्चास आयते हैं

ख़ुदा के नाम से (शुरू करता हूँ) जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है

(कोहे) तूर की क़सम (1) और उसकी किताब (लौहे महफूज़) की (2) जो क़ुशादा औराक़ में लिखी हुयी है (3) और बैतुल मामूर की (जो काबा के सामने फ़रिश्तों का कि़ब्ला है) (4) और ऊँची छत (आसमान) की (5) और जोश व ख़रोश वाले समुन्द्र की (6) कि तुम्हारे परवरदिगार का अज़ाब बेशक वाके़ए होकर रहेगा (7) (और) इसका कोई रोकने वाला नहीं (8) जिस दिन आसमान चक्कर खाने लगेगा (9) और पहाड़ उड़ने लागेंगें(10) तो उस दिन झुठलाने वालों की ख़राबी है (11) जो लोग बातिल में पड़े खेल रहे हैं (12) जिस दिन जहन्नुम की आग की तरफ़ उनको ढकेल ढकेल ले जाएँगे (13) (और उनसे कहा जाएगा) यही वह जहन्नुम है जिसे तुम झुठलाया करते थे (14) तो क्या ये जादू है या तुमको नज़र ही नहीं आता (15) इसी में घुसो फिर सब्र करो या बेसबरी करो (दोनों) तुम्हारे लिए यकसाँ हैं तुम्हें तो बस उन्हीं कामों का बदला मिलेगा जो तुम किया करते थे (16) बेशक परहेज़गार लोग बाग़ों और नेअमतों में होंगे (17) जो (जो नेअमतें) उनके परवरदिगार ने उन्हें दी हैं उनके मज़े ले रहे हैं और उनका परवरदिगार उन्हें दोज़ख़ के अज़ाब से बचाएगा (18) जो जो कारगुज़ारियाँ तुम कर चुके हो उनके सिले में (आराम से) तख़्तों पर जो बराबर बिछे हुए हैं (19) तकिए लगाकर ख़ूब मज़े से खाओ पियो और हम बड़ी बड़ी आँखों वाली हूर से उनका ब्याह रचाएँगे (20) और जिन लोगों ने ईमान क़़ुबूल किया और उनकी औलाद ने भी ईमान में उनका साथ दिया तो हम उनकी औलाद को भी उनके दर्जे पहुँचा देंगे और हम उनकी कारगुज़ारियों में से कुछ भी कम न करेंगे हर शख़्स अपने आमाल के बदले में गिरवी है (21) और जिस कि़स्म के मेवे और गोष्त को उनका जी चाहेगा हम उन्हें बढ़ाकर अता करेंगे (22) वहाँ एक दूसरे से शराब का जाम ले लिया करेंगे जिसमें न कोई बेहूदगी है और न गुनाह (23) (और खि़दमत के लिए) नौजवान लड़के उनके आस पास चक्कर लगाया करेंगे वह (हुस्न व जमाल में) गोया एहतियात से रखे हुए मोती हैं (24) और एक दूसरे की तरफ रूख़ करके (लुत्फ़ की) बातें करेंगे (25) (उनमें से कुछ) कहेंगे कि हम इससे पहले अपने घर में (ख़ुदा से बहुत) डरा करते थे (26) तो ख़ुदा ने हम पर बड़ा एहसान किया और हमको (जहन्नुम की) लौ के अज़ाब से बचा लिया (27) इससे क़ब्ल हम उनसे दुआएँ किया करते थे बेशक वह एहसान करने वाला मेहरबान है (28) तो (ऐ रसूल) तुम नसीहत किए जाओ तो तुम अपने परवरदिगार के फज़ल से न काहिन हो और न मजनून किया (29) क्या (तुमको) ये लोग कहते हैं कि (ये) शायर हैं (और) हम तो उसके बारे में ज़माने के हवादिस का इन्तेज़ार कर रहे हैं (30) तुम कह दो कि (अच्छा) तुम भी इन्तेज़ार करो मैं भी इन्तेज़ार करता हूँ (31) क्या उनकी अक़्लें उन्हें ये (बातें) बताती हैं या ये लोग हैं ही सरकश (32) क्या ये लोग कहते हैं कि इसने क़ुरान ख़ुद गढ़ लिया है बात ये है कि ये लोग ईमान ही नहीं रखते (33) तो अगर ये लोग सच्चे हैं तो ऐसा ही कलाम बना तो लाएँ (34) क्या ये लोग किसी के (पैदा किये) बग़ैर ही पैदा हो गए हैं या यही लोग (मक़लूक़ात के) पैदा करने वाले हैं (35) या इन्होने ही ने सारे आसमान व ज़मीन पैदा किए हैं (नहीं) बल्कि ये लोग यक़ीन ही नहीं रखते (36) क्या तुम्हारे परवरदिगार के ख़ज़ाने इन्हीं के पास हैं या यही लोग हाकिम हैं (37) या उनके पास कोई सीढ़ी है जिस पर (चढ़ कर आसमान से) सुन आते हैं जो सुन आया करता हो तो वह कोई सरीही दलील पेश करे (38) क्या ख़ुदा के लिए बेटियाँ हैं और तुम लोगों के लिए बेटे (39) या तुम उनसे (तबलीग़े रिसालत की) उजरत माँगते हो कि ये लोग क़र्ज़ के बोझ से दबे जाते हैं (40) या इन लोगों के पास ग़ैब (का इल्म) है कि वह लिख लेते हैं (41) या ये लोग कुछ दाँव चलाना चाहते हैं तो जो लोग काफि़र हैं वह ख़ुद अपने दांव में फँसे हैं (42) या ख़ुदा के सिवा इनका कोई (दूसरा) माबूद है जिन चीज़ों को ये लोग (ख़ुदा का) शरीक बनाते हैं वह उससे पाक और पाक़ीज़ा है (43) और अगर ये लोग आसमान से कोई अज़ाब (अज़ाब का) टुकड़ा गिरते हुए देखें तो बोल उठेंगे ये तो दलदार बादल है (44) तो (ऐ रसूल) तुम इनको इनकी हालत पर छोड़ दो यहाँ तक कि वह जिसमें ये बेहोश हो जाएँगे (45) इनके सामने आ जाए जिस दिन न इनकी मक्कारी ही कुछ काम आएगी और न इनकी मदद ही की जाएगी (46) और इसमें शक नहीं कि ज़ालिमों के लिए इसके अलावा और भी अज़ाब है मगर उनमें बहुतेरे नहीं जानते हैं (47) और (ऐ रसूल) तुम अपने परवरदिगार के हुक्म से इन्तेज़ार में सब्र किए रहो तो तुम बिल्कुल हमारी निगेहदाष्त में हो तो जब तुम उठा करो तो अपने परवरदिगार की हम्द की तस्बीह किया करो (48) और कुछ रात को भी और सितारों के ग़़ुरूब होने के बाद तस्बीह किया करो (49)
(दुवा: ऐ हमारे प्यारे अल्लाह जिस दिन हमारे आमाल का हिसाब होने लगे मुझे मेरे माँ बाप और खानदान वालो को और सारे ईमानवालो को तू अपनी खास रेहेमत से बख्श दे। आमीन)

सूरए अन नज्म (तारा) 53


53 सूरए अन नज्म (तारा)

                सूरए अन नज्म मक्का में नाजि़ल हुई है और इसकी बासठ आयतें हैं
            

            ख़ुदा के नाम से शुरू करता हूँ जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है

तारे की क़सम जब टूटा (1) कि तुम्हारे रफ़ीक़ (मोहम्मद) न गुमराह हुए और न बहके (2) और वह तो अपनी नफ़सियानी ख़्वाहिश से कुछ भी नहीं कहते (3) ये तो बस वही है जो भेजी जाती है (4) इनको निहायत ताक़तवर (फ़रिश्ते जिबरील) ने तालीम दी है (5) जो बड़ा ज़बरदस्त है और जब ये (आसमान के) ऊँचे (मुशरक़ो) किनारे पर था तो वह अपनी (असली सूरत में) सीधा खड़ा हुआ (6) फिर करीब हो (और आगे) बढ़ा (7) (फिर जिबरील व मोहम्मद में) दो कमान का फ़ासला रह गया (8) बल्कि इससे भी क़रीब था (9) ख़ुदा ने अपने बन्दे की तरफ जो ‘वही’ भेजी सो भेजी (10) तो जो कुछ उन्होने देखा उनके दिल ने झूठ न जाना (11) तो क्या वह (रसूल) जो कुछ देखता है तुम लोग उसमें झगड़ते हो (12) और उन्होने तो उस (जिबरील) को एक बार (शबे मेराज) और देखा है (13) सिदरतुल मुनतहा के नज़दीक (14) उसी के पास तो रहने की बेहिश्त है (15) जब छा रहा था सिदरा पर जो छा रहा था (16) (उस वक़्त भी) उनकी आँख न तो और तरफ़ माएल हुयी और न हद से आगे बढ़ी (17) और उन्होने यक़ीनन अपने परवरदिगार (की क़ुदरत) की बड़ी बड़ी निशानियाँ देखीं (18) तो भला तुम लोगों ने लात व उज़्ज़ा और तीसरे पिछले मनात को देखा (19) (भला ये ख़ुदा हो सकते हैं) (20) क्या तुम्हारे तो बेटे हैं और उसके लिए बेटियाँ (21) ये तो बहुत बेइन्साफ़ी की तक़सीम है (22) ये तो बस सिर्फ़ नाम ही नाम है जो तुमने और तुम्हारे बाप दादाओं ने गढ़ लिए हैं, ख़ुदा ने तो इसकी कोई सनद नाजि़ल नहीं की ये लोग तो बस अटकल और अपनी नफ़सानी ख़्वाहिश के पीछे चल रहे हैं हालाँकि उनके पास उनके परवरदिगार की तरफ़ से हिदायत भी आ चुकी है (23) क्या जिस चीज़ की इन्सान तमन्ना करे वह उसे ज़रूर मिलती है (24) आख़ेरत और दुनिया तो ख़ास ख़ुदा ही के एख़्तेयार में हैं (25) और आसमानों में बहुत से फ़रिश्ते हैं जिनकी सिफ़ारिश कुछ भी काम न आती, मगर ख़ुदा जिसके लिए चाहे इजाज़त दे दे और पसन्द करे उसके बाद (सिफ़ारिश कर सकते हैं) (26) जो लोग आख़ेरत पर ईमान नहीं रखते वह फ़रिश्ते के नाम रखते हैं औरतों के से नाम हालाँकि उन्हें इसकी कुछ ख़बर नहीं (27) वह लोग तो बस गुमान (ख़्याल) के पीछे चल रहे हैं, हालाँकि गुमान यक़ीन के बदले में कुछ भी काम नहीं आया करता, (28) तो जो हमारी याद से रदगिरदानी करे ओर सिर्फ़ दुनिया की जि़न्दगी ही का तालिब हो तुम भी उससे मुँह फेर लो (29) उनके इल्म की यही इन्तिहा है तुम्हारा परवरदिगार, जो उसके रास्ते से भटक गया उसको भी ख़ूब जानता है, और जो राहे रास्त पर है उनसे भी ख़ूब वाकि़फ है (30) और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज़ सब कुछ) ख़ुदा ही का है, ताकि जिन लोगों ने बुराई की हो उनको उनकी कारस्तानियों की सज़ा दे और जिन लोगों ने नेकी की है (उनकी नेकी की जज़ा दे) (31) जो सग़ीरा गुनाहों के सिवा कबीरा गुनाहों से और बेहयाई की बातों से बचे रहते हैं बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ी बख्शिश वाला है वही तुमको ख़ूब जानता है जब उसने तुमको मिटटी से पैदा किया और जब तुम अपनी माँ के पेट में बच्चे थे तो (तकब्बुर) से अपने नफ़्स की पाकीज़गी न जताया करो जो परहेज़गार है उसको वह ख़ूब जानता है (32) भला (ऐ रसूल) तुमने उस शख़्स को भी देखा जिसने रदगिरदानी की (33) और थोड़ा सा (ख़ुदा की राह में) दिया और फिर बन्द कर दिया (34) क्या उसके पास इल्मे ग़ैब है कि वह देख रहा है (35) क्या उसको उन बातों की ख़बर नहीं पहुँची जो मूसा के सहीफ़ों में है (36) और इबराहीम के (सहीफ़ों में) (37) जिन्होने (अपना हक़) (पूरा अदा) किया इन सहीफ़ों में ये है, कि कोई शख़्स दूसरे (के गुनाह) का बोझ नहीं उठाएगा (38) और ये कि इन्सान को वही मिलता है जिसकी वह कोशिश करता है (39) और ये कि उनकी कोशिश अनक़रीब ही (क़यामत में) देखी जाएगी (40) फिर उसका पूरा पूरा बदला दिया जाएगा (41) और ये कि (सबको आखि़र) तुम्हारे परवरदिगार ही के पास पहुँचना है (42) और ये कि वही हँसाता और रूलाता है (43) और ये कि वही मारता और जिलाता है (44) और ये कि वही नर और मादा दो किस्म (के हैवान) नुत्फे से जब (रहम में) डाला जाता है (45) पैदा करता है (46) और ये कि उसी पर (कयामत में) दोबारा उठाना लाजि़म है (47) और ये कि वही मालदार बनाता है और सरमाया अता करता है, (48) और ये कि वही शोअराए का मालिक है (49) और ये कि उसी ने पहले (क़ौमे) आद को हलाक किया (50) और समूद को भी ग़रज़ किसी को बाक़ी न छोड़ा (51) और (उसके) पहले नूह की क़ौम को बेशक ये लोग बड़े ही ज़ालिम और बड़े ही सरकश थे (52) और उसी ने (क़ौमे लूत की) उलटी हुयी बस्तियों को दे पटका (53) (फिर उन पर) जो छाया सो छाया (54) तो तू (ऐ इन्सान आखि़र) अपने परवरदिगार की कौन सी नेअमत पर शक किया करेगा (55) ये (मोहम्मद भी अगले डराने वाले पैग़म्बरों में से एक डरने वाला) पैग़म्बर है (56) कयामत क़रीब आ गयी (57) ख़ुदा के सिवा उसे कोई टाल नहीं सकता (58) तो क्या तुम लोग इस बात से ताज्जुब करते हो और हँसते हो (59) और रोते नहीं हो (60) और तुम इस क़दर ग़ाफि़ल हो तो ख़ुदा के आगे सजदे किया करो (61) और (उसी की) इबादत किया करो (62) सजदा
(दुवा: ऐ हमारे प्यारे अल्लाह जिस दिन हमारे आमाल का हिसाब होने लगे मुझे मेरे माँ बाप और खानदान वालो को और सारे ईमानवालो को तू अपनी खास रेहेमत से बख्श दे। आमीन)